2 अप्रैल 2019 मंगल प्रदोष या भौम प्रदोष व्रत का महत्व व पूजा विधि
यह व्रत हिंदु तिथि के अनुसार तेरहवें दिन यानी त्रयोदशी को होता है। त्रयोदशी अथवा प्रदोष व्रत हर महीने में दो बार आता है. एक शुक्ल पक्ष और दूसरा कृष्ण पक्ष । इस व्रत में भगवान महादेव की पूजा की जाती है। यह प्रदोष व्रत करने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते है और उन्हें शिव धाम की प्राप्ति होती है।
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2019 मंगल प्रदोष या भौम प्रदोष व्रत |
मंगल प्रदोष या भौम प्रदोष व्रत का महत्व
त्रयोदशी अर्थात् प्रदोष का व्रत करने वाला मनुष्य सदा सुखी रहता है। उसके सम्पूर्ण पापों का नाश इस व्रत से हो जाता है। इस व्रत के करने से सुहागन नारियों का सुहाग सदा अटल रहता है, बंदी कारागार से छूट जाता है। जो स्त्री पुरुष जिस कामना को लेकर इस व्रत को करते हैं, उनकी सभी कामनाएं कैलाशपति शंकर जी पूरी करते हैं। सूत जी कहते हैं. त्रयोदशी व्रत करने वाले को सौ गऊ दान का फल प्राप्त होता है। इस व्रत को जो विधि विधान और तन मन धन से करता है उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं।
पूजन सामग्री :-
1. धूप
2. दीप
4. घी
5. सफेद पुष्प
6. सफेद फूलों की माला
7. आंकड़े का फूल
8. सफेद मिठाइयां
9. सफेद चंदन
10. सफेद वस्त्र
11. जल से भरा हुआ कलश
12. कपूर
13. आरती के लिये थाली
14. बेल.पत्र
15. धतुरा
16. भांग
17. हवन सामग्री
18. आम की लक
मंगल प्रदोष या भौम प्रदोष व्रत की विधि
प्रदोष व्रत के दिन व्रती को प्रात:काल उठकर नित्य क्रम से निवृत हो स्नान कर शिव जी का पूजन करना चाहिये। पूरे दिन मन ही मन ‘‘ ऊँ नमरू शिवाय‘‘ का जप करें। पूरे दिन निराहार रहें। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सुर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व: शिव जी का पूजन करना चाहिये। प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे के बीच की जाती है। व्रती को चाहिये की शाम को दुबारा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर लें । पूजा स्थल अथवा पूजा गृह को शुद्ध कर लें।यदि व्रती चाहे तो शिव मंदिर में भी जा कर पूजा कर सकते हैं। पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर लें। कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भर लें। कुश के आसन पर बैठ कर शिव जी की पूजा विधि.विधान से करें। ‘‘ऊँ नम: शिवाय‘‘ कहते हुए शिव जी को जल अर्पित करें। इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर शिव जी का ध्यान करें।
ध्यान का स्वरूप-करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगलवर्ण के जटाजूटधारी, नीले कण्ठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुण्डल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किये हुए रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान शिव जी हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख समृद्धि प्रदान करें।
ध्यान के बाद मंगल प्रदोष या भौम प्रदोष की कथा सुने अथवा सुनायें। कथा समाप्ति के बाद। हवन सामग्री मिलाकर 11 या 21 या 108 बार ‘‘ऊँ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा‘‘ मंत्र से आहुति दें। उसके बाद शिव जी की आरती करें। उपस्थित जनों को आरती दें। सभी को प्रसाद वितरित करें । उसके बाद भोजन करें। भोजन में केवल मीठी सामग्रियों का उपयोग करें।

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