श्रीगंगानगर के सिविल लाइन में रहने वाले सिपाही सुरेन्द्र सिंह को बचपन से ही सेना में भर्ती होने का शौंक था। घर में बड़े भाई की जिम्मेदारी निभाते हुए स्वयं के साथ-साथ अपनी दो बहनों को भी पढ़ाया और 20 जुलाई 2004 को सेना में शामिल होने का सपना पूरा किया। मानसिक तथा शारीरिक रूप से कड़े प्रशिक्षण के बाद भारतीय सेना की अग्रणी कौर बंगाल इंजीनियर रूड़की में भेजा गया। वहां पर उन्होंने तकनीकी कर्मचारी के रूप में अच्छी सेवाएं दी। अपने कार्यकाल के दौरान लद्दाख के दुर्गम इलाके से लेकर भारत के हर कोने में तैनात किया गया। उन्होंने पूरे जोश के साथ अपने दमखम का परिचय दिया। सेवा में रहते हुए उन्हें खतरनाक लाइलाज बीमारी से गुजरना पड़ा। लेकिन इसकी परवाह न करते हुए वे लगातार सैन्य सेवा में लगे रहे। तबीयत ज्यादा खराब होने की वजह से उनके शरीर के निचले हिस्से ने काम करना बंद कर दिया। इसी कारण उन्होंने दो साल की सैन्य सेवा के बाद फौज से सेवानिवृत्ति ले ली। सुरेन्द्र सिंह अपने कभी हार न मानने वाले प्रेरणादायक व्यक्तित्व के लिए अपने परिवार में ही नहीं बल्कि पूरे कस्बे में सेना का गौरव माने जाते हैं।