
आमतौर पर श्राद्ध 16 दिन के ही होते हैं, लेकिन कभी-कभार एक ही दिन दो तिथियां पड़ने से इनकी संख्या घट-बढ़ सकती है। पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक कुल मिलाकर 16 तिथियां होती हैं। हर व्यक्ति की मृत्यु इन्हीं 16 तिथियों में से किसी एक तिथि को होती है।
लिहाजा, जिस तिथि को व्यक्ति की मृत्यु होती है, उसी के अनुसार उसके परिजन श्राद्ध करते हैं। मृतक के लिए श्रद्धा से किया गया तर्पण, पिंड तथा दान ही श्राद्ध कहा जाता है। अगर किसी को अपने परिजन की मृत्यु की तिथि नहीं पता हो, तो उनके लिए श्राद्ध अमावस्या तिथि को करना चाहिए।
नित्य श्राद्ध- पितृपक्ष के पूरे दिनों में हर रोज जल, अन्न, दूध और कुश से श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते हैं। इसे नित्य श्राद्ध कहा जाता है।
काम्य श्राद्ध- यह श्राद्ध विशेष सिद्धि को हासिल करने के लिए किया जाता है।
सपिंडन श्राद्ध- यह श्राद्ध मृत व्यक्ति के 12वें दिन किया जाता है। इसे महिलाएं भी कर सकती है।
गोष्ठी श्राद्ध- जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर श्राद्ध करते हैं, तो उसे गोष्ठी श्राद्ध कहते हैं।
कर्मांग श्राद्ध- किसी संस्कार के मौके पर किया जाता है।
यात्रार्थ श्राद्ध- यात्रा की सफलता के लिए किए जाने वाले श्राद्ध को याश्रार्थ श्राद्ध कहते हैं।
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